रामप्रकाश पांडेय-
छत्तीसगढ़ राज्य का जशपुर जिला संविधान के पांचवी अनुसूची में शामिल जिला है। इसका कारण यहां का अधिकांश क्षेत्र घने जंगलों से आच्छादित होकर 13 प्रकार से भी अधिक अनुसूचित जनजातियांे का निवास है। जहंा वे उनकी प्राचीन रीति, रिवाज, परंपराओं, पेड़ों, जंगली जानवरों, पक्षियों, मछलियों को अपनी परंपरा एंव गोत्र से जेाड़कर उनका संरक्षण एंव संवर्धन करते हुए यहां के पर्यावरण एंव जैव विविधता का संरक्षण करते आ रहे और इन्हीं अनुसूचित जनजातियों में से दो विशेष संरक्षित जनजाति कोरवा एंव बिरहोर भी हैं। जिनका सीधा संबंध आज भी जंगलों से जुड़ा हुआ है। और शायद इसी कारण से कि, इन जनजातियों का संरक्षण करने पर जंगलों एंव जैव विविधता का भी संरक्षण होगा। महामहिम राष्ट्रपति के द्वारा इन्हें अपना गोदपुत्र घोषित किया गया है। जब जंगल और जैव विविधता नष्ट हो रही हैं, तब स्वमेव महामहिम राष्ट्रपति द्वारा संरक्षित उनके गोद पुत्र कोरवा और बिरहोर के अस्तित्व पर भी प्रश्न चिन्ह खड़ा हो रहा है। ऐसे विषम परिस्थिति में शासन, प्रशासन का ध्यान इस ओर आकृष्ठ कराना उचित समझता हूॅं।
उक्त संबंध में यहां यह भी बताना लाजमी होगा कि, जशपुर के सुंदर प्राकृतिक वातावरण का प्रभाव यह है कि हजारों वर्षों से इस क्षेत्र के गांवो का नाम भी यहां के प्राकृतिक वातावरण एंव मौसम के आधार पर रखा गया है। उदाहरण स्वरूप ग्राम मनोरा का नाम यहां के मनोरम दृश्य के कारण मनोरा पड़ा। इसी प्रकार सन्ना ग्राम का नाम पूरे वर्ष ठंडी हवाओं के चलने और कान में सन्न् -सन्न की आवाज के कारण सन्ना रखा गया। जिले के सबसे बड़े विकासखंड बगीचा का नाम सर्वाधिक आम के पेड़ों के बगीचा के कारण रखा गया। पंड्रापाठ ग्राम जिसे आंचलिक बोली में पंड्रा अर्थात सफेद कहा जाता है से है और यहां की पहाड़ियाँ बर्फ से ढकी होकर सफेद दिखती थी। इसी कारण इस स्थान का नाम पंड्रापाठ पड़ा है। इसके अलावा भी अन्य छोटे-छोटे ग्रामों के नाम भी उन ग्रामों में खड़े पेड़ों के नाम पर पुकारे जाते हैं, जैसे करंज टोली, चंपा, सरईटोली, डूमरटोली, बरटोली, डहूकोना, हर्रापाठ, सेंधवार टोली, नीमगांव, आंबाटोली, महुआ टोली, तूतटोली सहित पर्यटन स्थल बेल महादेव जैसे स्थान आज भी इन्हीं नामों से चर्चित हैं। जैव विविधता को देखें तो कई ग्रामों के नाम विभिन्न् पक्षियों, नदियों व जानवरों के नाम पर भी रखे गए हैं। इसके उदाहरण स्वरूप मयूर चुंदी, शाहीडांड, कुकूरभूंका, गीधासांड, कुंजारा, सिकटा टोली, फरसाबहार सोनक्यारी जैसे सैकड़ों उदाहरण यह बताते हैं कि वनांचल में पर्यावरण व जैव विविध्ाता को लेकर संरक्षण आज का नहीं बल्कि वर्षों पुराना है।
जशपुर में वन संपदा के साथ यत्र-तत्र बाक्साइड, हीरा, सोना भी उपलब्ध है। बावजूद इसके इन धातुओं की अपेक्षा आज विश्व में पेड़ों को ही सबसे अनमोल माना जा सकता है। यहां के जंगलों और पेड़ों का संरक्षण एंव संवर्धन अति आवश्यक है, लेकिन जशपुर क्षेत्र में लगातार बाक्साइड खनन की सुगबुगाहट होती रहती है और इस हेतु भी विभिन्न् औद्योगिक घरानों के द्वारा यहां की जैव विविधताओं को नष्ट कर बाक्साइड खनन हेतु प्रयासरत रहना बड़े षडयंत्र की ओर इशारा करते हैं। जशपुर जिला जो पर्यटन का महत्वपूर्ण केंद्र हो सकता था, बावजूद इस दिशा में आज तक कोई ठोस पहल नहीं करना इस विषय के प्रति असंवेदनशीता को दर्शाती है। यह बात तब और प्रमाणित हो जाती है, जब प्रदेश सरकार की पर्यटन स्थलों की सूची से जशपुर जिला पूरी तरह से गायब कर दिया जाता है। इस तथ्य को तब और बल मिलता है कि जब जिले के संरक्षित वन क्षेत्र ग्राम गुल्लू में हाइड्रो पॉवर कंपनी जैसी संस्थाओं को स्थापित करने हेतु बिना दुरदर्शिता के प्रोत्साहन दे दिया जाता है। इसके संबंध में जनता को यह समझाइश दी जाती है कि हाइड्रो पॉवर उद्योग जैसे उद्योगों से जंगल एंव जैव विविधताओं को कोई क्षति नहीं होगी। इस प्रकार की बात कहकर क्षेत्र के पर्यावरण के लिहाज से बेशकिमती साजा, महुआ जैसे लगभग दस हजार से अधिक वृक्षों को काटकर पर्यावरण को गंभीर रूप से प्रभावित किया जाता है। साथ ही साथ जशपुर जिले की जीवन दायनी ईब नदी के बहाव को प्रभावित कर उसकी जैव विविधता को भी भारी मात्रा में नष्ट करने का कार्य किया गया है। स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब भारत सरकार के उस नियम का उलंघन होता है, जिसमें कहा गया है कि किसी संस्था के द्वारा किसी कार्य के लिए काटे गए पेड़ों के बदले दस गुणा पेड़ लगाए जाने चाहिए। उक्त कानून का सीधा उलंघन गुल्लू हाइड्रो कंपनी के द्वारा तथा राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 43 के निर्माण में किया गया। उनके द्वारा काटे गए वृक्षों के बदले आज तक जिले में कहीं भी एक भी वृक्ष नहीं लगाए गए हैं। जशपुर जिले में लगातार जिम्मेदार संस्थाओं एंव व्यक्तियों की उदासीनता का परिणाम यह है कि इस क्षेत्र में पाए जाने वाले महत्वपूर्ण फलदार एंव इमारती वृक्ष जैसे आंवला, हर्रा, बहेरा, चिरौंजी, महुआ, साल, बीजा, साजा, दहिमन, अर्जुन आदि वृक्ष विलुप्त होने के कगार पर आ चुके हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई वृक्षों के बीज तक उपलब्ध नहीं हैं, जिससे भविष्य में उनका संवर्धन किया जा सके और न ही इन विलुप्त हो रहे वृक्षों की कोई नर्सरी ही तैयार हो रही है। जिससे आने वाले समय में ऐसे पेड़ों का अस्तित्व बचाया जा सके।
रामप्रकाश पाण्डेय
वन मित्र जशपुर नगर
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