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*विशेष साप्ताहिक संपादकीय कॉलम “झरोखा मन का”….किताबें ही बढ़ाती हैं उचित निर्णय लेने की क्षमता*

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– विक्रांत पाठक

अक्सर हमें यह सुनने, पढ़ने में आता है कि अमुक व्यक्ति की अमुक पुस्तक प्रकाशित हुई। पर होता यह है कि कोई व्यक्ति पुस्तकों को प्रकाशित नहीं करता, बल्कि किताबें व्यक्ति को ‘ प्रकाशित’ करती हैं। आज के इस कॉलम में पुस्तकों पर चर्चा करना मुझे इसलिए भी ज़रूरी प्रतीत हुआ कि रविवार 23 अप्रैल को है और 23 अप्रैल को ही विश्व पुस्तक दिवस भी है। इस दिन को दुनिया भर में विश्व पुस्तक और कॉपीराइट दिवस के रूप में मनाया जाता है। जिसका प्रमुख उद्देश्य किताबों को पढ़ना, उनका प्रकाशन करना तथा प्रकाशन से सम्बंधित अधिकारों को दुनिया में बढ़ावा देना है। विश्व पुस्तक दिवस के संस्थापक बैरोनेस गेल रेबक का कहना था कि “हम पठन की स्थिति बदलने के लिए कुछ करना चाहते थे और हमारा संदेश आज भी वैसा ही है जैसा तब था – पढ़ना मज़ेदार, प्रासंगिक, सुलभ, रोमांचक है और इसमें जीवन को बदलने की शक्ति है।” निश्चित तौर पर पुस्तकों में वह शक्ति है कि वह किसी के जीवन को पूरी तरह बदल सकती हैं। ऐसे कई विद्वानों के उदाहरण हमें मिलते हैं, जिनका जीवन पुस्तकों ने बदल दिया।
पुस्तकें न केवल हमें अपनी कल्पना की दुनिया से परिचित कराती हैं, बल्कि बाहरी ज्ञान से अवगत भी कराती हैं। साथ ही हमारे कौशल को बढ़ाने, अच्छे आचरण, व्यवहार को निखारने और अच्छे गुणों को प्राप्त करने में मददगार भी हैं।
पुस्तकों के अध्ययन से हमें सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह होता है कि जीवन के किसी भी क्षेत्र व परिस्थिति में हममें उचित निर्णय की क्षमता विकसित होती है। कोई भी निर्णय अनायास नहीं होता। निर्णय दरअसल दर्शन शास्त्र का अहम विषय है। निर्णय के बारे में प्रख्यात दार्शनिक जी.एल.एस. शेकैल का कथन है कि ‘‘निणर्य लेना रचनात्मक मानसिक क्रिया का वह केन्द्र बिंदु होता है जहॉं ज्ञान, विचार, भावना और कल्पना कार्यपूर्ति के लिए एकत्र किए जाते हैं।” निर्णय की अपनी एक प्रक्रिया होती है। जिसमें समस्या को परिभाषित करना, समस्या का विश्लेषण करना, वैकल्पिक हलों पर विचार करना और उसके बाद सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन करना होता है। निश्चित रुप से पुस्तकें पढ़ने से हमारे अंदर स्वाभाविक रुप से यह क्षमता आने लगती है।

*इंटरनेट से सतही होती संवेदनाएं*

किताबों पर बात चल रही है, तो वर्तमान समय में आज की पीढ़ी की एक बड़ी समस्या पर बात करना जरूरी लगता है। आज के दिनों में प्रायः हर कोई मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट इत्यादि नई-नई तकनीकी का इस्तेमाल कर रहा है। पढ़ाई से संबंधित या अन्य कोई भी जानकारी के लिए छात्र या अन्य कोई तकनीकी के माध्यम से जानकारी प्राप्त करता है। पर कई बार इंटरनेट के माध्यम से मिली जानकारी आधी-अधूरी, तथ्यहीन या भ्रामक होती है। इंटरनेट के विषय में सबसे अहम समस्या सोशल मीडिया के रुप में है। सोशल मीडिया में स्क्रीनिंग टाइम अधिक होने से युवाओं व किशोरों का संवेग, उनकी संवेदनाएं और भावनाएं सतही होती जा रही हैं। जैसे:- फेसबुक पर मैंने किसी परिचित के निधन की पोस्ट पर शोक संदेश लिखा, उसके बाद उनकी स्मृति को संजोने का प्रयास कर रहा था कि किसी के विवाह की पोस्ट दिख गई, तत्काल उस पोस्ट पर कई इमोजी के साथ बधाई भी दे दिया। सब कुछ बस कुछ ही क्षणों में हो गया। न तो परिचित के निधन का शोक और न ही किसी विवाह की खुशी कुछ क्षण के लिए भी मन में टिक पाई।

*इसलिए बेहतर हैं किताबें*

ऊपर हुई चर्चा के आधार पर कह सकते हैं कि तकनीकी के इस युग में भी किताबों का अपना ही एक महत्व है। किताबों के माध्यम से हमें जो जानकारी मिलती है वह पूर्णतया साफ होती है। कभी-कभी किसी एक किताब में कुछ अनसुलझे पहलू भी हमें मिलते है। जिससे हमारे मन की उत्सुकता उसके बारे में जानने की होती है। हम उस बारे में जानने की कोशिश करने लगते हैं। इससे हमारी उत्सुकता बढ़ती है, नए विचारों का जन्म होता है एवं और अधिक पढ़ने की ओर प्रेरित होने लगते हैं। इंटरनेट पर पढ़ने के दौरान प्रायः संवेगात्मक और भावात्मक स्थायित्व का अभाव रहता है। वहीं स्क्रीन की लाइट आदि के दुष्प्रभाव भी शरीर के अलावा मन पर भी पड़ते हैं। जबकि पुस्तकें ज्ञान, नए विचार और दृष्टि देने के साथ ही मनोरंजन भी कराती हैं और हमें तनाव से दूर रखती हैं। मानसिक स्वास्थ्य के लिए किताबें सबसे अच्छी दोस्त मानी जाती हैं। ससेक्स विश्वविद्यालय में 2009 के एक अध्ययन में पाया गया कि पढ़ने से तनाव 68% तक कम हो सकता है। इसलिए खुद भी पुस्तकें पढ़ें और बच्चों को भी पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित करें।

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