जशपुरनगर। अखिल भारतीय जनजातिय सुरक्षा मंच के द्वारा पिछले 15 वर्षों से भी अधिक समय से चलाए जा रहे डिलिस्टिंग आंदोलन का प्रभाव अब देश व्यापी हो चुका है और देश के लगभग सभी राजधानी में हजारों की संख्या में आदिवासी समाज एकजुट होकर डिलिस्टिंग आंदोलन में अपनी सहमति और सहभागिता प्रदर्शित कर रहा है ,आंदोलन के बढ़ते प्रभाव को देखकर मिशनरियों के द्वारा आंदोलन के विरुद्ध आंदोलन की शुरुआत ईसाई आदिवासी महासभा के नाम पर जशपुर सरगुजा क्षेत्रों में की गई हालाकिं इन क्षेत्रों में महासभा के द्वारा काफी भीड़ जुटाई गई थी और इस आंदोलन को और व्यापक रूप देने के उद्देश्य से 10 जून को प्रदेश की राजधानी में विशाल आंदोलन करने और डिलिस्टिंग आंदोलन को कड़ा जबाब देने की योजना ईसाई आदिवासी महासभा ने बनाई थी और इसके लिए बड़ी तैयारी भी की गई थी ,गांव गांव से बस में भरकर लोगो को ले जाने की योजना थी ,महासभा ने दावा किया था कि उनके इस आंदोलन में लाखों लोग एकत्रित होंगे और डिलिस्टिंग आंदोलन को करारा जबाब दिया जाएगा ।किन्तु कल के आंदोलन में महज 3 हजार लोग ही एकत्रित हो पाए ,सभा के वक्ताओं ने भीड़ नहीं जुट पाने पर रायपुर के लोगों को ही कोसते नजर आए और कहा कि हम दूर दूर से लोगों को लेकर आए और हमें उम्मीद थी कि रायपुर से अधिक संख्या में लोग शामिल होंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ ।सभा मे झारखण्ड से आए एक वक्ता ने तो इसे धार्मिक आंदोलन ही कह डाला और इसमें सहभगिता करने की बात कही ।
बहरहाल रायपुर के ईसाई आदिवासी महासभा के आंदोलन पर चुटकी लेते हुए जनजातिय सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय संयोजक गणेश राम ने चर्चा करते हुए कहा कि डिलिस्टिंग आंदोलन आदिवासियों का आजादी के बाद का सबसे बड़ा आंदोलन है कार्तिक उरांव जी ने इसे बीस साल की काली रात कहा था मैं इसे 75 साल की काली रात कहता हूं।और अब समय आ गया है डिलिस्टिंग पर कठोर कानून बनाये जाने का और इसके लिए समय भी अनुकूल है ।हमारे इस पवित्र आंदोलन से देश के 12 करोड़ आदिवासी जुड़े हैं और सबके मन मे 75 वर्ष की काली रात को समाप्त कर नया कानून बबाकर आदिवासियों के लिए एक नई रोशनी का इंतजार है ।ऐसे समय मे ईसाई मिशनरियों की छटपटाहट वाजिब है क्योंकि अब उनके अस्तित्व पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं।श्री भगत ने कहा डिलिस्टिंग के विरोध में ईसाई मिशनरियों के द्वारा ईसाई आदिवासी महासभा का गठन करना ही हास्यप्रद है विरोध करने वाले पहले यह तो बताएं कि ईसाई आदिवासी आखिर किस चिड़िया का नाम है इस नाम की कौन से जाति भारत के संविधान में अनुसूचित जनजातियों की सूची में है।मिशनरियों की इस चाल को देश का आदिवासी समाज समझ रहा है और इसी कारण अधिकांश संख्या में ऐसे समझदार लोग जिन्हें मिशनरियों के द्वारा चंगाई के माध्यम से ठग फुसला कर ईसाई बनाया था वे जात भीतर कार्यक्रम के माध्यम से सनातन धर्म मे वापस आ रहे हैं ।और आज भी हजारों की संख्या में ऐसे लोग हमारे सम्पर्क में है आने वाले समय मे हम बड़ी संख्या में जात भीतर का आयोजन करेंगे ।रायपुर में कल मिशनरियों के द्वारा आयोजित फ्लाफ आयोजन से भी यह प्रमाणित हो गया है की अब प्रदेश के आदिवासी मिशनरियों के साथ नहीं है और जल्द ही उनकी दुकानदारी बन्द होने वाली है ।
बहरहाल कल रायपुर में ईसाई आदिवासी महासभा के फ्लाफ आयोजन के बाद देखना यह होगा कि अब महासभा इस विषय पर क्या रणनीति बनाता है ।
*इस विषय पर जब ईसाई आदिवासी महासभा के प्रदेश अध्यक्ष अनिल किस्पोट्टा से ग्राउण्ड जीरो ई न्यूज ने बात किया तब उनका कहना है कि हमारा आंदोलन सफल रहा और अच्छी खासी भीड़ भी थी ।*
