*सजन बंजारा की रिपोर्ट..!*
कोतबा,जशपुरनगर:-छत्तीसगढ़ शासन की महत्वाकांक्षी धान खरीदी योजना में पारदर्शिता के तमाम दावे सुरंगपानी खरीदी केंद्र में खोखले साबित हुए हैं। यहाँ उजागर हुए फर्जीवाड़े ने यह सिद्ध कर दिया है कि शासन द्वारा प्रचारित “अधिकारियों की सख्ती” केवल एक छलावा थी, जबकि पर्दे के पीछे राजस्व विभाग, खरीदी केंद्र प्रभारी और बिचौलियों का एक संगठित सिंडिकेट सरकारी खजाने को लाखो की चपत लगा रहा था। धान खरीदी की प्रक्रिया, जिसे अभेद्य और पारदर्शी बताया जाता है, उसके हर चरण—गिरदावरी, सत्यापन, टोकन और तौलाई—पर सवालिया निशान लग गए हैं।
धान खरीदी योजना में योजनाबद्ध तरीके से हुए व्यापक भ्रष्टाचार की एक ऐसी परत उघड़ी है, जिसमें राजस्व विभाग,खरीदी केंद्र एवं बिचौलियों के गठजोड़ को बेनकाब कर दिया है। ग्राम पंचायत सुरंगपानी में अनेको कृषक के नाम पर फर्जी तरीके से रकबा जोड़कर और नियम विरुद्ध टोकन जारी कर फर्जी धान खरीदी कर शासन को लाखों रुपये की चपत लगाने का मामला प्रकाश में आया है।
फर्जीवाड़ा ऐसा की जाँच हो तो हेराफेरी के कई राज सामने आ जाएंगे। इस फर्जीवाड़ा गिरोह के बिचौलियों ने अनेको किसानों के खातों में प्रसाशन व खरीदी केन्द्र के पदाधिकारियों कर्मचारियों के साथ मिलीभगत कर बड़े फर्जीवाड़े को अंजाम दिया है। मिली जानकारी के अनुसार पहले राजस्व अभिलेखों में दूसरे किसानों की जमीन को अपने परिचित किसानों के पंजीयन में फर्जी तरीके से एग्रिस्टेग करवा कर पंजीयन करवाया गया। बकायदा गिदवारी से लेकर पंजीयन सत्यापन धान खरीदी की पूरी प्रक्रिया में हेराफेरी कर बोगस धान खरीदी करवा कर छत्तीसगढ़ सरकार को लाखों की चपत लगा चुके है। इस पूरे सिंडिगेट का पर्दाफाश तब हुवा जब एक किसान का चार बार टोकन जारी हुवा ऒर बोगस खरीदी की भनक मीडिया को लगी जिसके बाद रिकार्ड में पड़ताल करने पर पता चला कि राजस्व अभिलेखों के अनुसार, कार्तिक पिता दखल साय (जाति-गोंड) के नाम पर कुल 06 खसरा नंबर और 2.335 हेक्टेयर भूमि दर्ज है। लेकिन आरोप है कि प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत से कार्तिक राम पिता उजागर नामक कृषक की जमीन के 4 बड़े खसरा नंबरों को फर्जी तरीके से कार्तिक (पिता दखल साय) के नाम पर जोड़ दिया गया। जो कि 134/1,139/1,291/8,293 रकबे में कुल भूमि 5.516 हेक्टेयर जमीन को फर्जी तरीके से पंजीयन करा कर 875 बोरी धान की खरीदी कर फर्जीवाड़े को अंजाम दिया गया है। इस फर्जी रकबे का न केवल एग्रीस्टेक किया गया, बल्कि बिना भौतिक सत्यापन के इसे पोर्टल पर चढ़ा दिया गया ताकि अधिक मात्रा में धान की बिक्री की जा सके। इसी प्रकार किसान भरत चौहान पिता रामसाय चौहान के पास राजस्व अभिलेख में 8 खसरे के नंबर में 1.786 हेक्टेयर जमीन सामलाती खाते की है. जिसमे चार हिस्सेदार सदस्य है। परंतु उस किसान के पंजीयन में बिचौलियों द्वारा पटवारी व तहसीलदार के साथ साठगांठ कर कुल रकबा 4.239 हेक्टेयर का फर्जी पंजीयन कराया गया।जिसमे दिलीप नामक किसान का 133/1 रकबा 0.1780 हेक्टेयर एवं मु.गतिबाला पिता शिवप्रसाद सहित आठ अन्य हिस्सेदार की राजस्व अभिलेख में दर्ज भूमि में से 5 खसरा नम्बर क्रमशः 448/1 523/1 525/2 533/1 647/3 ग्राम सुरंगपानी का कुल रकबा 1.369 को फर्जी तरीके से जोड़कर लगभग 146 क्विंटल मतलब 365 बोरी धान अवैधानिक रूप से बेचा गया।
*टोकन जारी करने में संदिग्ध सक्रियता..!*
इस मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू टोकन जारी करने की प्रक्रिया है। नियमानुसार और भौतिक स्थिति के विपरीत, कंप्यूटर ऑपरेटर और फड़ प्रभारी की मिलीभगत से तीन के बजाय चार बार टोकन जारी किए गए जिसमें 7 जनवरी 2026 को 150 क्विंटल (375) बोरी, 23 जनवरी 2026: 246 क्विंटल (615 बोरी) का एक टोकन जारी किया गया, जिसे बाद में संदिग्ध परिस्थितियों में निरस्त कर दिया गया।इसके बाद 30 जनवरी 2026: इसी कृषक के नाम पर दोबारा 100 क्विंटल (250 बोरी) का फर्जी टोकन जारी हुआ। 05 फरवरी 2026: पुनः 100 क्विंटल का एक और टोकन जारी कर धान की खरीदी भी पूर्ण कर ली गई।वही किसान भरत चौहान पिता रामसाय चौहान का टोकन दिनांक 29/12/2025 को 146 क्विंटल 356 बोरी धान बिक्री किया है।
*अधिकारियों और ऑपरेटरों की संदिग्ध भूमिका..!*
जानकारी के अनुसार, इस पूरे सिंडिकेट में बागबहार तहसीलदार, संबंधित पटवारी, नोडल अधिकारी, फड़ प्रभारी और कंप्यूटर ऑपरेटर की भूमिका संदिग्ध है। आरोप है कि इन सभी की आपसी साठ-गांठ से ही राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव और पोर्टल पर फर्जी एंट्री संभव हो पाई है।सुरंगपानी धान खरीदी केंद्र में यह केवल दो मामला सामने आया है। यदि सूक्ष्मता से जांच की जाए, तो ऐसे दर्जनों मामले सामने आ सकते हैं जहाँ वास्तविक किसानों के हक पर डाका डालकर कागजी रकबा बढ़ाकर अवैध कमाई की गई है।”
*राजस्व रिकार्ड में हेराफेरी कर शासन को लाखों की क्षति..!*
धान खरीदी सत्र के दौरान प्रशासन ने सीमाओं पर नाकेबंदी और कोचियों को पकड़ने का खूब प्रचार किया, लेकिन असल खेल “सिस्टम” के भीतर चल रहा था। सुरंगपानी का मामला बताता है कि असली लुटेरे बाहर नहीं, बल्कि कंप्यूटर सिस्टम और राजस्व रिकॉर्ड रूम के भीतर बैठे थे।
बड़ा सवाल यह है कि जब हर किसान का रकबा आधार और एग्रीस्टेक से लिंक है, तो बिना भौतिक सत्यापन के हवा में जमीन का रकबा कैसे बढ़ गया.! क्या यह संभव है कि पटवारी से लेकर तहसीलदार और नोडल अधिकारी तक, किसी को भी इसकी भनक न लगी हो.! फर्जी एग्रीस्टेक और अवैध टोकन के माध्यम से बेचे गए धान की राशि सीधे तौर पर सरकारी खजाने को नुकसान पहुँचा रही है। ग्रामीणों और जागरूक नागरिकों ने इस मामले की उच्च स्तरीय जांच और दोषियों पर एफआईआर दर्ज करने की मांग की है।
”मामले की जानकारी मिली है। यह गंभीर विषय है। संबंधित किसानों के नाम व ब्यौरे की पतासाजी की जा रही है। निश्चित ही दोषी अधिकारी-कर्मचारी पर कड़ी कार्यवाही की जाएगी।”
*ऋतुराज बिसेन, एसडीएम, पत्थलगांव*
”यह अत्यंत संवेदनशील मामला है। मैं तत्काल इसे कलेक्टर साहब के संज्ञान में लाता हूँ। जांच के बाद कड़ी कार्यवाही होगी।”
*शम्भू गुप्ता, डीएमओ, जशपुरनगर*
