जशपुरनगर,ग्राउंडजीरो ई न्यूज।साल वृक्ष तो आप सब ने देखा होगा। जनजातिय बाहुल्य जशपुर जिले में साल के वृक्ष बहुतायत मात्रा में मौजूद हैं। पतझड़ के मौसम में दूसरे वृक्ष गर्मी के दौरान अपनी नमी बचाएं रखने के लिए स्वयं को पत्ते विहिन कर लेते हैं,ऐसे समय में प्रकृतिक का यह अनुपम उपहार,ना केवल वन को हरियाली की चादर ओढ़ाएं रखता है,बल्कि इसके फूलों से जशपुर के पर्यावरण का अनुपम सौंदर्य और भी निखर आता है। आदिवासी समाज में इस वृक्ष का विशेष सामाजिक और धार्मिक महत्व भी है। लेकिन क्या आप जानते हैं प्रकृति का यह वरदान हमारी प्यास बुझाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है? साल पेड़ो को लेकर कई जानकारी लोगों को है उंसके बारे में कहा जाता है कि सौ साल खड़ा सौ साल पड़ा तब जाकर जौ भर सड़ा। कहा जाता है कि भारत की अधिकांश रेल पटरियों में जशपुरांचल के साल की लकड़ियों का प्रयोग हुआ है जो सौ साल से भी अधिक समय होने का बाद भी इस कहावत को चरितार्थ करती हुई सुरक्षित हैं।कहा तो यह भी जाता है कि आगरा के ताजमहल के नीचे भी साल की लकड़ियाँ लगाई गई हैं जो ताजमहल को पानी से बचा रही हैं। बहरहाल साल की महिमा अपरमपार है । साल वृक्षों का मानवता को सबसे बड़ा उपहार है कि यह वृक्ष जल का सबसे बड़ा स्रोत्र होती हैं देश की अधिकांश नदियां साल के जंगलों से ही निकली हैं नर्मदा, ईब ,कन्हर आदि । हम साल का एक दूसरा रूप आपको दिखा रहे हैं जहाँ साल के वृक्ष के खोह से जल प्रकट हुआ है साल का वृक्ष गिर चुका लेकिन आज भी उंसके खोह में जल का कुंड बना हुआ है । ग्रामीण इसे काठ डाड़ी बोलते हैं।यह दृश्य जशपुर के सन्ना तहसील के कवई ग्राम के पास स्थित है । ऐसे कई कुंड क्षेत्र में थे लेकिन उचित देखरेख के अभाव में नष्ट हो चुके हैं।इस कुंड को लेकर जशपुर डीएफओ जितेंद्र उपाध्याय का कहना है कि जशपुर पर्यटन के लिए यह अद्भुत है वह विभाग इसका संरक्षण करने की योजना बना रहा है ।
