*जशपुर।* जिले में जमीन आवंटन को लेकर ऐसा मामला सामने आया है जिसने राजस्व विभाग, पंचायत रिकॉर्ड और न्यायिक फैसलों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि नदी किनारे सस्ती जमीन खरीदकर कागजों में कथित हेराफेरी की गई और बाद में उसे नदी में समाहित बताकर मुआवजे के नाम पर स्टेट हाईवे किनारे करोड़ों की बेशकीमती जमीन हासिल कर ली गई।
*118 पन्नों के दस्तावेज क्या कहते हैं*

उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक सेठ ओम प्रकाश अग्रवाल ने 1 जून 2012 को खसरा नंबर 100/2 की जमीन राजेंद्र प्रसाद, अवधेश कुमार और सुमित्रा सिंह से 7 लाख 23 हजार रुपए में खरीदी थी। यह जमीन नदी किनारे स्थित बताई जा रही है। बाद में दावा किया गया कि जमीन का कुछ हिस्सा नदी में समाहित हो गया। वहीं स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि संबंधित जमीन पहले से ही नदी क्षेत्र में थी। इसके बावजूद उसी जमीन के एवज में शासन से दूसरी जमीन की मांग की गई। ग्रामीणों का दावा है कि नदी में समाहित जमीन एकड़ में नहीं, डिसमिल में थी।
*सबसे बड़ा सवाल: नदी किनारे के बदले हाईवे किनारे जमीन कैसे*?

नियम स्पष्ट हैं। नदी में समाहित जमीन के बदले वैकल्पिक जमीन तभी दी जा सकती है जब संबंधित व्यक्ति के पास खेती या गुजर-बसर के लिए दूसरा कोई साधन या जमीन न हो। फिर नदी किनारे की जमीन के बदले स्टेट हाईवे से लगी करोड़ों रुपए मूल्य की व्यावसायिक जमीन कैसे आवंटित कर दी गई?
*कलेक्टर कोर्ट ने नकारा, कमिश्नर कोर्ट से मिली मंजूरी*

जानकारी के अनुसार 2023 में मामला सबसे पहले जशपुर कलेक्टर कोर्ट पहुंचा था। सुनवाई के बाद कलेक्टर कोर्ट ने छत्तीसगढ़ शासन, राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग के 21 अक्टूबर 2025 के प्रावधानों का हवाला देते हुए आवेदन को “विचारणीय एवं प्रचलन योग्य नहीं” मानते हुए निरस्त कर दिया था। यानी कलेक्टर कोर्ट ने माना कि मामला नियमों के अनुरूप नहीं है।

लेकिन इसके बाद कमिश्नर कोर्ट से सेठ ओम प्रकाश अग्रवाल के पक्ष में फैसला आने के बाद पूरा मामला सवालों में आ गया। अब लोग पूछ रहे हैं कि कलेक्टर कोर्ट को जो नियम और दस्तावेज दिखे, क्या वे बाद में नजरअंदाज कर दिए गए? क्या करोड़ों की जमीन आवंटित करते समय दस्तावेजों में कथित ओवरराइटिंग और सफेदा भी नहीं दिखा?
*पंचायत पंजी में काटछांट, सफेदा के निशान*

मामले में बगीचा जनपद क्षेत्र की बिमड़ा पंचायत की 19 जून 2023 की बैठक पंजी भी विवाद में है। पंजी में जगह-जगह सफेदा, काटछांट और ओवरराइटिंग के निशान दिखने की बात सामने आ रही है। ऐसे संदिग्ध रिकॉर्ड के आधार पर इतना बड़ा फैसला कैसे लिया गया, यह बड़ा सवाल है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच हो जाए तो जमीन आवंटन, दस्तावेजी हेराफेरी और प्रभावशाली दबाव से जुड़े कई खुलासे हो सकते हैं। अब यह मामला सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल बन चुका है।
मुख्यमंत्री सहित संबंधित अधिकारियों को लिखित शिकायत भेजी जा चुकी है। अब देखना होगा कि शासन आवंटित जमीन का दोबारा परीक्षण कर निरस्त करता है या करोड़ों का मामला फाइलों में ही दब जाता है।
