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Chhattisgarh

*जाते-जाते दरवाजे पर रसूखदारों की भीड़ जोड़ गया “विश्वबंधु” कवियों ने काव्यांजलि से श्रद्धा सुमन अर्पित कर भिगोया सबका मन*

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जशपुरनगर। राष्ट्रीय कवि संगम, जशपुर इकाई के द्वारा ऑनलाइन काव्य संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें ज़िले के तमाम साहित्यकारों की उपस्थिति के अलावा राज्य भर के साहित्यकारों की गरिमामयी उपस्थिति में स्वर्गीय विश्वबंधु शर्मा “अनिकेत’ को काव्यांजलि अर्पित की गई।

उल्लेखनीय है कि स्वर्गीय विश्वबंधु शर्मा के द्वारा जशपुर जिले में काव्य व साहित्य की विधा को जीवंत बनाए रखने का कार्य सतत किया जाता रहा।साहित्य से जुड़े प्रबुद्ध वर्ग की एक बड़ी फौज उनके साथ जुड़ी हुई थी।रायपुर से जुड़े वरिष्ठ कवि डॉ. सतीश देशपाण्डे की अध्यक्षता में कार्यक्रम संपन्न हुआ। जशपुर राष्ट्रीय कवि संगम के अध्यक्ष मनव्वर अशरफ़ी ने मंच का संचालन किया। कार्यक्रम की शुरुआत सरस्वती वंदना से हुई, जिसे अंबिकापुर से जुड़े वरिष्ठ कवि रंजित सारथी ने अपने सुमधुर आवाज से प्रस्तुत किया।इस काव्य गोष्ठी के माध्यम से दिवंगत विश्वबंधु शर्मा को कवियों ने साहित्यिक श्रद्धांजलि अर्पित की।

सभी साहित्यकारों ने स्व.शर्मा की विशेष स्मृति में अपनी-अपनी भावपूर्ण बातें रखीं। वरिष्ठ गज़लकार अनिल सिंह ‘अनल’ ने भावुक होकर कहा कि विश्वबंधु मेरे दिल के बेहद करीब थे। हमलोग साथ में ही अपनी साहित्यिक सफ़र का आगाज़ किए थे। उनका इस तरह से अचानक चले जाना मेरे लिए बेहद दुखद व सद्मापूर्ण घटना है। इनके पश्चात वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. मिथलेश पाठक ने दिवंगत के प्रति अपनी भावनाओं को प्रकट किया। तत्पश्चात हास्य कवि राजेश जैन ने अपनी बातें रखते हुए विश्वबंधु की आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की तथा उन्हें अपना दुःख-सुख का साथी व अभिभावक के तौर पर प्रतिस्थापित किया। इसके साथ ही ज़िले की दो वरिष्ठ कवित्रियों श्रीमती शुभा मिश्र और अनीता गुप्ता की नव-प्रकाशित काव्य संग्रह पुस्तकों पर बधाई स्वरूप खास चर्चाएँ भी हुईं। कार्यक्रम के आख़िरी सत्र में सभी कवियों-कवयित्रियों ने अपनी-अपनी प्रतिनिधि रचनाओं से कार्यक्रम की शोभा में चार चाँद लगाया। कार्यक्रम को कामयाब बनाने में जशपुर राष्ट्रीय कवि संगम के ज़िला संयोजक मिलन मलरिहा, कवि सुशील पाठक, कवि राजेंद्र प्रेमी, युवा कवयित्री शैली मिश्रा, कवि सिद्धि कांत मिश्र, कवि मुकेश चौहान, जयराम नागवंशी इत्यादि लोगों का विशेष योगदान रहा।
सुशील पाठक ने विश्वबंधु शर्मा जी की जीवनी पर प्रकाश डाला एवं उन्ही की रचना से श्रद्धांजलि अर्पित किया, “नजर में अश्क हाथों में छलकता जाम होता है, मोहब्बत करने वालो का यही अंजाम होता है।” सुशील पाठक ने सम्वेदना का जिक्र करते हुए भावुक होकर कहा कि मैं सम्वेदना का संस्थापक सदस्य होने के नाते उसे आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हूँ, आप सब का सहयोग अपेक्षित है, हम सब स्वर्गीय श्री शर्मा जी के समस्त कार्यों को मजबूती से आगे बढ़ाएं यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।कवि राजेश जैन ने ये पंक्तियाँ पढ़ीं “बडा हरदिल आजीज रहा वो सख्स
जाते जाते दरवाजे पर , रसूख दारो भीड़ जोड़ गया/
ऐसा क्या , बहाना था जो
फूल सी बेटी को बिलखता छोड़ गया/ जिसने हजारों को अपना, निवाला खिलाया
जिसने कई बिछड़ो को, अपनो से मिलाया
हर रोज हर पल ,दूसरो के लिए जिया जो शख्स
आज अपनो से रिश्ता तोड़ गया/ जाते जाते दरवाजे पर ,
रसूख दारों की भीड़ जोड़ गया/ सम्वेदना की अलख जगाकर,
खुद ओझल हो गया
कहीं नजर नही आता, तारा मंडल में खो गया/
आंखे भी बेइंतहा , निहार रही उसकी राह
अनिकेत शिव नाम से ,नाता जोड़ गया/
जाते जाते दरवाजे पर ,
रसूख दारो भीड़ जोड़ गया/

कवि पुष्पेन्द्र शुक्ला ने ये कविता पढ़ी

” ” अनिकेत हूं मैं , मुझे अनिकेत ही रहने दो ” आया दुनिया में बंद मुट्ठी किए हुए , कुछ नाम , कुछ काम लिए हुए । शरारतें बचपन की , कुछ जवानी की यादें , इन चुलबुली फिजाओं से कुछ कह लेने दो , अनिकेत हूं मैं , मुझे अनिकेत ही रहने दो ।। सफर वो स्कूल से कॉलेज का , असर वो एल.एल.बी.से नॉलेज का । जीवंत हुई पत्रकारी से पत्रकारिता , खिल उठी संवेदना से सहभागिता । अब तो कुछ वेदनाओं को सह लेने दो , अनिकेत हूं मैं , मुझे अनिकेत ही रहने दो ।। यारी – दोस्ती में हुए अर्पण में , गृहस्थी जीवन के समर्पण में कुछ नोंक – झोंक , कुछ नादानियां , कुछ कही – अनकही कहानियां । जरा लोगों के दर्द – सा विष पी लेने दो , अनिकेत हूं मैं , मुझे अनिकेत ही रहने दो ।। भले ही मैं हूं नहीं , पर मेरे होने का एहसास है , सामाजिक – सांस्कृतिक सौहार्द्र की आप सबसे आस है । संज्ञा नायाब हीरे की , दी है आप सभी ने , संभाव्य जशपुर की कृति से जशपुर कुछ खास है । सम्हाल लो ! कानों को सरगम मेरे सुन लेने दो , अनिकेत हूं मैं , मुझे अनिकेत ही रहने दो ।। चंद काव्यों की छटा बिखेरा हूं , शाम नहीं , मैं सुनहरा सबेरा हूं । ग्राउंड जीरो का हीरो हूं मैं , कलम मेरे हाथ में न सही । अब दूजे के हाथों से जरा चलने दो , अनिकेत हूं मैं , मुझे अनिकेत ही रहने दो ।। ‘ पुष्पेन्द्र शुक्ला ” पुष्पराज *

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