(-विक्रांत पाठक)
जंतर-मंतर पर हुए युवाओं के हालिया विरोध प्रदर्शन ने देश का ध्यान दो अलग-अलग कोणों से आकर्षित किया है—एक तरफ प्रदर्शनकारियों की मूल माँगे, तो दूसरी तरफ उनके द्वारा प्रयुक्त उग्र भाषा। सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा के विमर्श तक इस बात को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएँ आईं कि युवाओं ने सार्वजनिक मंचों की लोकतांत्रिक मर्यादा लांघकर अपशब्दों का प्रयोग किया। लेकिन एक परिपक्व लोकतंत्र के रूप में इस पूरे घटनाक्रम को केवल ‘संस्कारहीनता’ या ‘अशिष्टता’ कहकर खारिज कर देना समस्या के मूल से आँखें मूंदना होगा। यह बहस सिर्फ नैतिकता की नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक-डिजिटल संस्कृति, मनोविज्ञान और संवाद के ढहते ढाँचे की है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो उग्र और अनफ़िल्टर्ड भाषा अक्सर गहरे आक्रोश, हताशा और संस्थागत अविश्वास का तात्कालिक प्रस्फुटन होती है। जब किसी समूह को यह महसूस होता है कि उसकी बात को औपचारिक और सुसंस्कृत रास्तों से नहीं सुना जा रहा, तो भाषा का स्थापित संयम टूटता है।
आज की नई पीढ़ी के लिए अत्यधिक ‘शिष्ट’ या नपी-तुली भाषा में एक प्रकार का औपचारिकतावादी ढोंग होता है। उनके लिए अपशब्द केवल किसी को अपमानित करने का साधन नहीं, बल्कि अपनी भावनाओं की प्रामाणिकता और तीव्रता को बिना किसी फ़िल्टर के व्यक्त करने का जरिया बनते जा रहे हैं।
इस पूरे विवाद का सबसे चिंताजनक पक्ष समाज का दोहरा रवैया है। एक तरफ हमारा पॉप-कल्चर, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और सिनेमा दिन-रात गालियों और उग्र भाषा को ‘यथार्थवाद’ तथा ‘कलात्मक अभिव्यक्ति’ के नाम पर परोस रहे हैं, जिसे दर्शक सहर्ष स्वीकारते हैं। दूसरी तरफ, जब वही भाषा सड़कों पर किसी नागरिक आंदोलन के दौरान गूँजती है, तो वही समाज अचानक आहत होने का दावा करता है।
यहाँ समाजशास्त्र की ‘टोन पोलिसिंग’ की अवधारणा भी स्पष्ट दिखाई देती है। जब स्थापित व्यवस्था के पास प्रदर्शनकारियों के ‘तर्कों’ और ‘माँगों’ का सीधा उत्तर नहीं होता, तो बहस का रुख आंदोलनकारियों के ‘तरीके और भाषा’ की ओर मोड़ दिया जाता है। इस प्रक्रिया में आंदोलन का मूल मुद्दा नेपथ्य में चला जाता है और सारा ध्यान संस्कारों की दुहाई देने पर केंद्रित हो जाता है।
भाषा शास्त्र का नियम है कि भाषा कभी स्थिर नहीं रहती। जिस प्रकार अतीत में ‘कलमुंहा’ या ‘नासपीटा’ जैसे शब्द अपनी मारक क्षमता खोकर सामान्य हो गए, उसी प्रकार आज के कई अपशब्द भी अपने मूल अश्लील अर्थ को खोकर केवल बात पर ज़ोर देने वाले शब्द (Intensifiers) बनते जा रहे हैं।
इसके साथ ही, डिजिटल क्रांति ने ‘निजी बातचीत’ और ‘सार्वजनिक विमर्श’ के बीच की पारंपरिक विभाजन-रेखा को मिटा दिया है। जो भाषा व्हाट्सएप ग्रुप्स, प्राइवेट कॉल्स और रील्स में बोली जा रही है, वह स्वाभाविक रूप से अब सार्वजनिक नारों और पोस्टरों में छलक रही है।
सार्वजनिक विमर्श या लोकतांत्रिक आंदोलनों में अपशब्दों के प्रयोग को किसी भी सूरत में आदर्श नागरिक आचरण नहीं माना जा सकता। अत्यधिक आक्रामक भाषा तात्कालिक रूप से ध्यान भले खींच ले, लेकिन अंततः वह आंदोलन की नैतिक गंभीरता को चोट पहुँचाती है और विरोधियों को मुख्य मुद्दे से भटकने का आसान बहाना देती है। हालाँकि, युवाओं की इस भाषा को सिर्फ एक नैतिक पतन मानकर खारिज करने के बजाय, समाज और सत्ता को उस आक्रोश, अकेलेपन और संस्थागत अविश्वास की जड़ों को तलाशना होगा जहाँ से यह उग्रता उपज रही है। जब तक संवाद के औपचारिक माध्यम संवेदनशील और सार्थक नहीं होंगे, तब तक सड़कों पर असंतोष की भाषा अपनी सीमाएँ लांघती ही रहेगी।
